हम रास्ते के मुलाजिम जब थे, तब अच्छा था...
कभी किसी लम्बी काली सुरंग में सांप सी रेंगती
एक सुपेरफ़स्ट ट्रेन के अनारक्षित डब्बे के फर्श पर
साधारण से दस लोगों के बीच अपनी जगह बनाने में जुटे होते.
तो कभी उत्तर प्रदेश के किसी गुमनाम बीहड़ इलाके से गुज़रती
सरपट दौड़ती रेलगाड़ी के पांचवे डब्बे की साइड अप्पर बर्थ में
यूरोप और अमेरिका के साम्राज्यवादी ईतीहास पढ़ते पाए जाते.
खैर, अब इस स्थिर ज़िन्दगी के बीच एक नया अस्तित्व तलाशना है.
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